शास्त्री जी ने “जय जवान-जय किसान” का नारा पहली बार कहां दिया था

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साल 1965 में सरहद पर भारत पाकिस्तान का युद्ध चल रहा था और अमेरिका ने भारत को गेंहू देने से मना कर दिया था। एक तरफ जवान जंग लड़ रहे थे तो दूसरी ओर भारत के खाद्दान्न की कमी हो गई थी। उस वक्त भारत के तत्कालीन प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री किसानों से मिलने इलाहाबाद (प्रयागराज) के करछना विधानसभा क्षेत्र के उरुवा गांव पहुंच गए।

ऊरूवा चौराहे पर किसानों को संबोधित करते हुए लाल बहादुर शास्त्री ने पहली बार कहा कि- हम एक वक्त खाएंगे, लेकिन अमेरिका के सामने नहीं झुकेंगे। सभा मे किसानों ने शास्त्री जी के आवाहन का पुरजोर समर्थन किया और यही उन्होंने पहली बार “जय जवान-जय किसान” का नारा दिया।

इस सभा मे शास्त्री जी ने एक वक्त अन्न न ग्रहण करने की कसम खाई और खुद उनके साथ पूरे देश के किसानों ने एक वक्त के अन्न का परित्याग कर दिया।

इस वाकये के साथ इस ऎतिहासिक क्षण का गवाह रहने वाले करछना विधानसभा क्षेत्र का नाम भी इतिहास में दर्ज हो गया और यहां से दिया गया यह नारा देशभर में गूंज उठा। लोग कहते हैं शास्त्री जी ने यह नारा पहली बार अक्टूबर 1965 में दशहरे के दिन दिल्ली के रामलीला मैदान में दिया, लेकिन यह गलत तथ्य है।

शास्त्रीजी ने पहली बार- ‘जय जवान,-जय किसान’ का नारा प्रयागराज के उरुवा में दिया था। इसके बाद रामलीला मैदान में यह बात दोहराई थी, जिसकी पुष्टि न केवल प्रसिद्ध साहित्यकार हरि मोहन मालवीय करते हैँ बल्कि इस नारे के वक्त वहां मौजूद रहे शास्त्री जी के बेटे अनिल शास्त्री ने भी की थी।

उरुवा प्रयागराज जनपद मुख्यालय से 40 किमी दूर यमुनापार क्षेत्र का एक गांव है, जो मेजारोड से मात्र 5 किमी दूर प्रयागराज-मिर्जापुर मार्ग पर पड़ता है।

बता दें प्रयागराज शास्त्री जी की कर्मभूमि रही है और वे 1957 व 1962 में यहां से सांसद बनकर दिल्ली गए थे। एक बार शास्त्री जी प्रयागराज के संगम क्षेत्र के माघमेले में भी खो गए थे।

खैर, 1965 में शास्त्रीजी के दिए इस नारे की वस्तुस्थिति को जानना आज भी हमारे लिए आवश्यक है। दरअसल, तत्कालीन प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री ने जनता से हर खाली जमीन पर खेती की अपील की थी। उन्होंने खुद भी अपने सरकारी आवास के लॉन पर सब्जियां बोना शुरू कर दिया था।

इस नारे के पीछे शास्त्रीजी की सोच बेहद स्पष्ट थी। तब 1962 के भारत-चीन युद्ध से देश आर्थिक रूप से कमजोर हो चुका था। जब लाल बहादुर शास्त्री प्रधानमंत्री बने तब देश में खाने का संकट था। फिर आया साल 1965, जब मानसून कमजोर रहा। अकाल की नौबत आ गई।

इसी दौरान 5 अगस्त 1965 को 30 हजार पाकिस्तानी सैनिक एलओसी पार करके कश्मीर में घुस आए। भारतीय सेना ने उसका जोरदार जवाब दिया। 6 सितंबर 1965 को भारतीय सेना ने लाहौर तक कब्जा कर लिया। पाकिस्तान के 90 टैंक ध्वस्त कर दिए गए।

यह वो दौर था जब हम अमेरिका की पीएल-480 स्कीम के तहत हासिल लाल गेहूं खाने को बाध्य थे। इसी बीच, अमेरिका के राष्ट्रपति लिंडन जॉनसन ने शास्त्रीजी को धमकी दी, अगर युद्ध नहीं रुका तो गेहूं का निर्यात बंद कर दिया जाएगा। शास्त्रीजी ने कहा- बंद कर दीजिए गेहूं देना। इतना ही नहीं, उन्होंने अमेरिका से गेहूं लेने से भी साफ इनकार कर दिया। तब शास्त्रीजी ने लोगों से सप्ताह में एक दिन व्रत रखने को कहा। यही नहीं, उन्होंने खुद भी व्रत रखना शुरू कर दिया।

इस नारे में संदेश साफ था कि शास्त्रीजी देश को आत्मनिर्भर बनने की प्रेरणा दे रहे थे। साथ ही इसमें वह हर किसी को अपना योगदान देने के लिए भी कह रहे थे। यही नहीं, जवानों के साथ साथ उन्होंने किसानों की महत्ता को भी एक समान स्थान देते हुए यह समझाने की कोशिश की थी कि अगर सीमा पर हमारे जवान मुस्तैदी से टिके हैं तो हम सुरक्षित हैं लेकिन यदि हमारे किसान भी उतनी ही मुस्तैदी के साथ खेती में जुटे हैं, तो देश में कभी कोई भूख से नहीं मर सकता।

शास्त्रीजी ने देश की जनता को हफ्ते में एक दिन भूखे रहने के लिए कहा ताकि देश में अन्न की कमी न होने पाए। भूख से किसी की जान न चली जाए। अगर हर कोई एक दिन भूखा रहे तो कितने अन्य जरूरतमंदों को भोजन मुहैया ​कराया जा सकेगा। इससे अन्न का संकट देश में नजर नहीं आएगा। साथ ही हम एकजुट होकर विदेशी ताकतों का सामना कर पाएंगे।

शास्त्री जी के इस नारे ने देश में जवानों, किसानों और जनता को एकजुट कर दिया था। शायद यही वजह रही कि इसके ठीक 2 साल बाद 1967 में जब चौथा लोकसभा चुनाव हआ तो उसमें कांग्रेस को प्रचंड सफलता मिली। गौरतलब है कि तब देश की कुल 520 लोकसभा सीटों में से कांग्रेस को 283 सीटें मिली थी। आज हम सभी देश वासी जय जवान जय किसान के नारे के साथ किसानों को मान्यता दिलाने वाले शास्त्री जी को उनकी जयंती पर शत शत नमन करते हैं।

(लेखक स्वतंत्र पत्रकार हैं)

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